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غزلیات حافظ از ۴۰۱ تا ۴۹۵
۴۰۱
چون شوم خاک رهش دامن بيفشاند ز من ---------------------------------------------------- ۴۰۲
نکته اي دلکش بگويم خال آن مه رو ببين ---------------------------------------------------- ۴۰۳
شراب لعل کش و روي مه جبينان بين ---------------------------------------------------- ۴۰۴
مي فکن بر صف رندان نظري بهتر از اين ---------------------------------------------------- ۴۰۵
به جان پير خرابات و حق صحبت او ---------------------------------------------------- ۴۰۶
گفتا برون شدي به تماشاي ماه نو ---------------------------------------------------- ۴۰۷
مزرع سبز فلک ديدم و داس مه نو ---------------------------------------------------- ۴۰۸
اي آفتاب آينه دار جمال تو ---------------------------------------------------- ۴۰۹
اي خونبهاي نافه چين خاک راه تو ---------------------------------------------------- ۴۱۰
اي قباي پادشاهي راست بر بالاي تو ---------------------------------------------------- ۴۱۱
تاب بنفشه مي دهد طره مشک ساي تو ---------------------------------------------------- ۴۱۲
مرا چشميست خون افشان ز دست آن کمان ابرو ---------------------------------------------------- ۴۱۳
خط عذار يار که بگرفت ماه از او ---------------------------------------------------- ۴۱۴
گلبن عيش مي دمد ساقي گلعذار کو ---------------------------------------------------- ۴۱۵
اي پيک راستان خبر يار ما بگو ---------------------------------------------------- ۴۱۶
خنک نسيم معنبر شمامه اي دلخواه ---------------------------------------------------- ۴۱۷
عيشم مدام است از لعل دلخواه ---------------------------------------------------- ۴۱۸
گر تيغ بارد در کوي آن ماه ---------------------------------------------------- ۴۱۹
وصال او ز عمر جاودان به ---------------------------------------------------- ۴۲۰
ناگهان پرده برانداخته اي يعني چه ---------------------------------------------------- ۴۲۱
در سراي مغان رفته بود و آب زده ---------------------------------------------------- ۴۲۲
اي که با سلسله زلف دراز آمده اي ---------------------------------------------------- ۴۲۳
دوش رفتم به در ميکده خواب آلوده ---------------------------------------------------- ۴۲۴
از من جدا مشو که توام نور ديده اي ---------------------------------------------------- ۴۲۵
دامن کشان همي شد در شرب زرکشيده ---------------------------------------------------- ۴۲۶
از خون دل نوشتم نزديک دوست نامه ---------------------------------------------------- ۴۲۷
چراغ روي تو را شمع گشت پروانه ---------------------------------------------------- ۴۲۸
سحرگاهان که مخمور شبانه ---------------------------------------------------- ۴۲۹
ساقي بيا که شد قدح لاله پر ز مي ---------------------------------------------------- ۴۳۰
به صوت بلبل و قمري اگر ننوشي مي ---------------------------------------------------- ۴۳۱
لبش مي بوسم و در مي کشم مي ---------------------------------------------------- ۴۳۲
مخمور جام عشقم ساقي بده شرابي ---------------------------------------------------- ۴۳۳
اي که بر ماه از خط مشکين نقاب انداختي ---------------------------------------------------- ۴۳۴
اي دل مباش يک دم خالي ز عشق و مستي ---------------------------------------------------- ۴۳۵
با مدعي مگوييد اسرار عشق و مستي ---------------------------------------------------- ۴۳۶
آن غاليه خط گر سوي ما نامه نوشتي ---------------------------------------------------- ۴۳۷
اي قصه بهشت ز کويت حکايتي ---------------------------------------------------- ۴۳۸
سبت سلمي بصدغيها فوادي ---------------------------------------------------- ۴۳۹
ديدم به خواب دوش که ماهي برآمدي ---------------------------------------------------- ۴۴۰
سحر با باد مي گفتم حديث آرزومندي ---------------------------------------------------- ۴۴۱
چه بودي ار دل آن ماه مهربان بودي ---------------------------------------------------- ۴۴۲
به جان او که گرم دسترس به جان بودي ---------------------------------------------------- ۴۴۳
چو سرو اگر بخرامي دمي به گلزاري ---------------------------------------------------- ۴۴۴
شهريست پرظريفان و از هر طرف نگاري ---------------------------------------------------- ۴۴۵
تو را که هر چه مراد است در جهان داري ---------------------------------------------------- ۴۴۶
صبا تو نکهت آن زلف مشک بو داري ---------------------------------------------------- ۴۴۷
بيا با ما مورز اين کينه داري
----------------------------------------------------
اي که در کوي خرابات مقامي داري ---------------------------------------------------- ۴۴۹
اي که مهجوري عشاق روا مي داري ---------------------------------------------------- ۴۵۰
روزگاريست که ما را نگران مي داري ---------------------------------------------------- ۴۵۱
خوش کرد ياوري فلکت روز داوري ---------------------------------------------------- ۴۵۲
طفيل هستي عشقند آدمي و پري ---------------------------------------------------- ۴۵۳
اي که دايم به خويش مغروري ---------------------------------------------------- ۴۵۴
ز کوي يار مي آيد نسيم باد نوروزي ---------------------------------------------------- ۴۵۵
عمر بگذشت به بي حاصلي و بوالهوسي ---------------------------------------------------- ۴۵۶
نوبهار است در آن کوش که خوشدل باشي ---------------------------------------------------- ۴۵۷
هزار جهد بکردم که يار من باشي ---------------------------------------------------- ۴۵۸
اي دل آن دم که خراب از مي گلگون باشي ---------------------------------------------------- ۴۵۹
زين خوش رقم که بر گل رخسار مي کشي ---------------------------------------------------- ۴۶۰
سليمي منذ حلت بالعراق ---------------------------------------------------- ۴۶۱
کتبت قصه شوقي و مدمعي باکي ---------------------------------------------------- ۴۶۲
يا مبسما يحاکي درجا من اللالي ---------------------------------------------------- ۴۶۳
سلام الله ما کر الليالي ---------------------------------------------------- ۴۶۴
بگرفت کار حسنت چون عشق من کمالي ---------------------------------------------------- ۴۶۵
رفتم به باغ صبحدمي تا چنم گلي ---------------------------------------------------- ۴۶۶
اين خرقه که من دارم در رهن شراب اولي ---------------------------------------------------- ۴۶۷
زان مي عشق کز او پخته شود هر خامي ---------------------------------------------------- ۴۶۸
که برد به نزد شاهان ز من گدا پيامي ---------------------------------------------------- ۴۶۹
انت روائح رند الحمي و زاد غرامي ---------------------------------------------------- ۴۷۰
سينه مالامال درد است اي دريغا مرهمي ---------------------------------------------------- ۴۷۱
ز دلبرم که رساند نوازش قلمي ---------------------------------------------------- ۴۷۲
احمد الله علي معدله السلطان ---------------------------------------------------- ۴۷۳
وقت را غنيمت دان آن قدر که بتواني ---------------------------------------------------- ۴۷۴
هواخواه توام جانا و مي دانم که مي داني ---------------------------------------------------- ۴۷۵
گفتند خلايق که تويي يوسف ثاني ---------------------------------------------------- ۴۷۶
نسيم صبح سعادت بدان نشان که تو داني ---------------------------------------------------- ۴۷۷
دو يار زيرک و از باده کهن دومني ---------------------------------------------------- ۴۷۸
نوش کن جام شراب يک مني ---------------------------------------------------- ۴۷۹
صبح است و ژاله مي چکد از ابر بهمني ---------------------------------------------------- ۴۸۰
اي که در کشتن ما هيچ مدارا نکني ---------------------------------------------------- ۴۸۱
بشنو اين نکته که خود را ز غم آزاده کني ---------------------------------------------------- ۴۸۲
اي دل به کوي عشق گذاري نمي کني ---------------------------------------------------- ۴۸۳
سحرگه ره روي در سرزميني ---------------------------------------------------- ۴۸۴
تو مگر بر لب آبي به هوس بنشيني ---------------------------------------------------- ۴۸۵
ساقيا سايه ابر است و بهار و لب جوي ---------------------------------------------------- ۴۸۶
بلبل ز شاخ سرو به گلبانگ پهلوي ---------------------------------------------------- ۴۸۷
اي بي خبر بکوش که صاحب خبر شوي ---------------------------------------------------- ۴۸۸
سحرم هاتف ميخانه به دولتخواهي ---------------------------------------------------- ۴۸۹
اي در رخ تو پيدا انوار پادشاهي ---------------------------------------------------- ۴۹۰
در همه دير مغان نيست چو من شيدايي ---------------------------------------------------- ۴۹۱
به چشم کرده ام ابروي ماه سيمايي ---------------------------------------------------- ۴۹۲
سلامي چو بوي خوش آشنايي ---------------------------------------------------- ۴۹۳ اي پادشه خوبان داد از غم تنهايي ---------------------------------------------------- ۴۹۴
اي دل گر از آن چاه زنخدان به درآيي ---------------------------------------------------- ۴۹۵
مي خواه و گل افشان کن از دهر چه مي جويي
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نوشته شده در دوشنبه یازدهم مرداد ۱۳۸۹ساعت 23:14 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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غزلیات حافظ از ۳۰۱ تا ۴۰۰
۳۰۱
اي دل ريش مرا با لب تو حق نمک ---------------------------------------------------- ۳۰۲
خوش خبر باشي اي نسيم شمال ---------------------------------------------------- ۳۰۳
شممت روح وداد و شمت برق وصال ---------------------------------------------------- ۳۰۴
داراي جهان نصرت دين خسرو کامل ---------------------------------------------------- ۳۰۵
به وقت گل شدم از توبه شراب خجل ---------------------------------------------------- ۳۰۶
اگر به کوي تو باشد مرا مجال وصول ---------------------------------------------------- ۳۰۷
هر نکته اي که گفتم در وصف آن شمايل ---------------------------------------------------- ۳۰۸
اي رخت چون خلد و لعلت سلسبيل ---------------------------------------------------- ۳۰۹
عشقبازي و جواني و شراب لعل فام ---------------------------------------------------- ۳۱۰
مرحبا طاير فرخ پي فرخنده پيام ---------------------------------------------------- ۳۱۱
عاشق روي جواني خوش نوخاسته ام ---------------------------------------------------- ۳۱۲
بشري اذ السلامه حلت بذي سلم ---------------------------------------------------- ۳۱۳
بازآي ساقيا که هواخواه خدمتم ---------------------------------------------------- ۳۱۴
دوش بيماري چشم تو ببرد از دستم ---------------------------------------------------- ۳۱۵
به غير از آن که بشد دين و دانش از دستم ---------------------------------------------------- ۳۱۶
زلف بر باد مده تا ندهي بر بادم ---------------------------------------------------- ۳۱۷
فاش مي گويم و از گفته خود دلشادم ---------------------------------------------------- ۳۱۸
مرا مي بيني و هر دم زيادت مي کني دردم ---------------------------------------------------- ۳۱۹
سال ها پيروي مذهب رندان کردم ---------------------------------------------------- ۳۲۰
ديشب به سيل اشک ره خواب مي زدم ---------------------------------------------------- ۳۲۱
هر چند پير و خسته دل و ناتوان شدم ---------------------------------------------------- ۳۲۲
خيال نقش تو در کارگاه ديده کشيدم ---------------------------------------------------- ۳۲۳
ز دست کوته خود زير بارم ---------------------------------------------------- ۳۲۴
گر چه افتاد ز زلفش گرهي در کارم ---------------------------------------------------- ۳۲۵
گر دست دهد خاک کف پاي نگارم ---------------------------------------------------- ۳۲۶
در نهانخانه عشرت صنمي خوش دارم ---------------------------------------------------- ۳۲۷
مرا عهديست با جانان که تا جان در بدن دارم ---------------------------------------------------- ۳۲۸
من که باشم که بر آن خاطر عاطر گذرم ---------------------------------------------------- ۳۲۹
جوزا سحر نهاد حمايل برابرم ---------------------------------------------------- ۳۳۰
تو همچو صبحي و من شمع خلوت سحرم ---------------------------------------------------- ۳۳۱
به تيغم گر کشد دستش نگيرم ---------------------------------------------------- ۳۳۲
مزن بر دل ز نوک غمزه تيرم ---------------------------------------------------- ۳۳۳
نماز شام غريبان چو گريه آغازم ---------------------------------------------------- ۳۳۴
گر دست رسد در سر زلفين تو بازم ---------------------------------------------------- ۳۳۵
در خرابات مغان گر گذر افتد بازم ---------------------------------------------------- ۳۳۶
مژده وصل تو کو کز سر جان برخيزم ---------------------------------------------------- ۳۳۷
چرا نه در پي عزم ديار خود باشم ---------------------------------------------------- ۳۳۸
من دوستدار روي خوش و موي دلکشم ---------------------------------------------------- ۳۳۹
خيال روي تو چون بگذرد به گلشن چشم ---------------------------------------------------- ۳۴۰
من که از آتش دل چون خم مي در جوشم ---------------------------------------------------- ۳۴۱
گر من از سرزنش مدعيان انديشم ---------------------------------------------------- ۳۴۲
حجاب چهره جان مي شود غبار تنم ---------------------------------------------------- ۳۴۳
چل سال بيش رفت که من لاف مي زنم ---------------------------------------------------- ۳۴۴
عمريست تا من در طلب هر روز گامي مي زنم ---------------------------------------------------- ۳۴۵
بي تو اي سرو روان با گل و گلشن چه کنم ---------------------------------------------------- ۳۴۶
من نه آن رندم که ترک شاهد و ساغر کنم ---------------------------------------------------- ۳۴۷
صنما با غم عشق تو چه تدبير کنم ---------------------------------------------------- ۳۴۸
ديده دريا کنم و صبر به صحرا فکنم ---------------------------------------------------- ۳۴۹
دوش سوداي رخش گفتم ز سر بيرون کنم ---------------------------------------------------- ۳۵۰
به عزم توبه سحر گفتم استخاره کنم ---------------------------------------------------- ۳۵۱
حاشا که من به موسم گل ترک مي کنم ---------------------------------------------------- ۳۵۲
روزگاري شد که در ميخانه خدمت مي کنم ---------------------------------------------------- ۳۵۳
من ترک عشق شاهد و ساغر نمي کنم ---------------------------------------------------- ۳۵۴
به مژگان سيه کردي هزاران رخنه در دينم ---------------------------------------------------- ۳۵۵
حاليا مصلحت وقت در آن مي بينم ---------------------------------------------------- ۳۵۶
گرم از دست برخيزد که با دلدار بنشينم ---------------------------------------------------- ۳۵۷
در خرابات مغان نور خدا مي بينم ---------------------------------------------------- ۳۵۸
غم زمانه که هيچش کران نمي بينم ---------------------------------------------------- ۳۵۹
خرم آن روز کز اين منزل ويران بروم ---------------------------------------------------- ۳۶۰
گر از اين منزل ويران به سوي خانه روم ---------------------------------------------------- ۳۶۱
آن که پامال جفا کرد چو خاک راهم ---------------------------------------------------- ۳۶۲
ديدار شد ميسر و بوس و کنار هم ---------------------------------------------------- ۳۶۳
دردم از يار است و درمان نيز هم ---------------------------------------------------- ۳۶۴
ما بي غمان مست دل از دست داده ايم ---------------------------------------------------- ۳۶۵
عمريست تا به راه غمت رو نهاده ايم ---------------------------------------------------- ۳۶۶
ما بدين در نه پي حشمت و جاه آمده ايم ---------------------------------------------------- ۳۶۷
فتوي پير مغان دارم و قوليست قديم ---------------------------------------------------- ۳۶۸
خيز تا از در ميخانه گشادي طلبيم ---------------------------------------------------- ۳۶۹
ما ز ياران چشم ياري داشتيم ---------------------------------------------------- ۳۷۰
صلاح از ما چه مي جويي که مستان را صلا گفتيم ---------------------------------------------------- ۳۷۱
ما درس سحر در ره ميخانه نهاديم ---------------------------------------------------- ۳۷۲
بگذار تا ز شارع ميخانه بگذريم ---------------------------------------------------- ۳۷۳
خيز تا خرقه صوفي به خرابات بريم ---------------------------------------------------- ۳۷۴
بيا تا گل برافشانيم و مي در ساغر اندازيم ---------------------------------------------------- ۳۷۵
صوفي بيا که خرقه سالوس برکشيم ---------------------------------------------------- ۳۷۶
دوستان وقت گل آن به که به عشرت کوشيم ---------------------------------------------------- ۳۷۷
ما شبي دست برآريم و دعايي بکنيم ---------------------------------------------------- ۳۷۸
ما نگوييم بد و ميل به ناحق نکنيم ---------------------------------------------------- ۳۷۹
سرم خوش است و به بانگ بلند مي گويم ---------------------------------------------------- ۳۸۰
بارها گفته ام و بار دگر مي گويم ---------------------------------------------------- ۳۸۱
گر چه ما بندگان پادشهيم ---------------------------------------------------- ۳۸۲
فاتحه اي چو آمدي بر سر خسته اي بخوان ---------------------------------------------------- ۳۸۳
چندان که گفتم غم با طبيبان ---------------------------------------------------- ۳۸۴
مي سوزم از فراقت روي از جفا بگردان ---------------------------------------------------- ۳۸۵
يا رب آن آهوي مشکين به ختن بازرسان ---------------------------------------------------- ۳۸۶
خدا را کم نشين با خرقه پوشان ---------------------------------------------------- ۳۸۷
شاه شمشادقدان خسرو شيرين دهنان ---------------------------------------------------- ۳۸۸
بهار و گل طرب انگيز گشت و توبه شکن ---------------------------------------------------- ۳۸۹
چو گل هر دم به بويت جامه در تن ---------------------------------------------------- ۳۹۰
افسر سلطان گل پيدا شد از طرف چمن ---------------------------------------------------- ۳۹۱
خوشتر از فکر مي و جام چه خواهد بودن ---------------------------------------------------- ۳۹۲
داني که چيست دولت ديدار يار ديدن ---------------------------------------------------- ۳۹۳
منم که شهره شهرم به عشق ورزيدن ---------------------------------------------------- ۳۹۴
اي روي ماه منظر تو نوبهار حسن ---------------------------------------------------- ۳۹۵
گلبرگ را ز سنبل مشکين نقاب کن ---------------------------------------------------- ۳۹۶
صبح است ساقيا قدحي پرشراب کن ---------------------------------------------------- ۳۹۷
ز در درآ و شبستان ما منور کن ---------------------------------------------------- ۳۹۸
اي نور چشم من سخني هست گوش کن ---------------------------------------------------- ۳۹۹
کرشمه اي کن و بازار ساحري بشکن ---------------------------------------------------- ۴۰۰
بالابلند عشوه گر نقش باز من
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نوشته شده در دوشنبه یازدهم مرداد ۱۳۸۹ساعت 23:8 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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غزلیات حافظ از ۱۰۱ تا ۲۰۰
۱۰۱
شراب و عيش نهان چيست کار بي بنياد ---------------------------------------------------- ۱۰۲
دوش آگهي ز يار سفرکرده داد باد ---------------------------------------------------- ۱۰۳
روز وصل دوستداران ياد باد ---------------------------------------------------- ۱۰۴
جمالت آفتاب هر نظر باد ----------------------------------------------------
۱۰۵
صوفي ار باده به اندازه خورد نوشش باد ---------------------------------------------------- ۱۰۶
تنت به ناز طبيبان نيازمند مباد ---------------------------------------------------- ۱۰۷
حسن تو هميشه در فزون باد ---------------------------------------------------- ۱۰۸
خسروا گوي فلک در خم چوگان تو باد ---------------------------------------------------- ۱۰۹
دير است که دلدار پيامي نفرستاد ----------------------------------------------------
۱۱۰
پيرانه سرم عشق جواني به سر افتاد ---------------------------------------------------- ۱۱۱
عکس روي تو چو در آينه جام افتاد ---------------------------------------------------- ۱۱۲
آن که رخسار تو را رنگ گل و نسرين داد ---------------------------------------------------- ۱۱۳
بنفشه دوش به گل گفت و خوش نشاني داد ---------------------------------------------------- ۱۱۴
هماي اوج سعادت به دام ما افتد ----------------------------------------------------
۱۱۵
درخت دوستي بنشان که کام دل به بار آرد ---------------------------------------------------- ۱۱۶
کسي که حسن و خط دوست در نظر دارد ---------------------------------------------------- ۱۱۷
دل ما به دور رويت ز چمن فراغ دارد ---------------------------------------------------- ۱۱۸
آن کس که به دست جام دارد ---------------------------------------------------- ۱۱۹
دلي که غيب نماي است و جام جم دارد ----------------------------------------------------
۱۲۰
بتي دارم که گرد گل ز سنبل سايه بان دارد ---------------------------------------------------- ۱۲۱
هر آن کو خاطر مجموع و يار نازنين دارد ---------------------------------------------------- ۱۲۲
هر آن که جانب اهل خدا نگه دارد ---------------------------------------------------- ۱۲۳
مطرب عشق عجب ساز و نوايي دارد ---------------------------------------------------- ۱۲۴
آن که از سنبل او غاليه تابي دارد ----------------------------------------------------
۱۲۵
شاهد آن نيست که مويي و مياني دارد ---------------------------------------------------- ۱۲۶
جان بي جمال جانان ميل جهان ندارد ---------------------------------------------------- ۱۲۷
روشني طلعت تو ماه ندارد ---------------------------------------------------- ۱۲۸
نيست در شهر نگاري که دل ما ببرد ---------------------------------------------------- ۱۲۹
اگر نه باده غم دل ز ياد ما ببرد ----------------------------------------------------
۱۳۰
سحر بلبل حکايت با صبا کرد ---------------------------------------------------- ۱۳۱
بيا که ترک فلک خوان روزه غارت کرد ---------------------------------------------------- ۱۳۲
به آب روشن مي عارفي طهارت کرد ---------------------------------------------------- ۱۳۳
صوفي نهاد دام و سر حقه باز کرد ---------------------------------------------------- ۱۳۴
بلبلي خون دلي خورد و گلي حاصل کرد ----------------------------------------------------
۱۳۵
چو باد عزم سر کوي يار خواهم کرد ---------------------------------------------------- ۱۳۶
دست در حلقه آن زلف دوتا نتوان کرد ---------------------------------------------------- ۱۳۷
دل از من برد و روي از من نهان کرد ---------------------------------------------------- ۱۳۸
ياد باد آن که ز ما وقت سفر ياد نکرد ---------------------------------------------------- ۱۳۹
رو بر رهش نهادم و بر من گذر نکرد ----------------------------------------------------
۱۴۰
دلبر برفت و دلشدگان را خبر نکرد ---------------------------------------------------- ۱۴۱
ديدي اي دل که غم عشق دگربار چه کرد ---------------------------------------------------- ۱۴۲
دوستان دختر رز توبه ز مستوري کرد ---------------------------------------------------- ۱۴۳
سال ها دل طلب جام جم از ما مي کرد ---------------------------------------------------- ۱۴۴
به سر جام جم آن گه نظر تواني کرد ----------------------------------------------------
۱۴۵
چه مستيست ندانم که رو به ما آورد ---------------------------------------------------- ۱۴۶
صبا وقت سحر بويي ز زلف يار مي آورد ---------------------------------------------------- ۱۴۷
نسيم باد صبا دوشم آگهي آورد ---------------------------------------------------- ۱۴۸
يارم چو قدح به دست گيرد ---------------------------------------------------- ۱۴۹ دلم جز مهر مه رويان طريقي بر نمي گيرد ز هر در مي دهم پندش وليکن در نمي گيرد خدا را اي نصيحتگو حديث ساغر و مي گو که نقشي در خيال ما از اين خوشتر نمي گيرد بيا اي ساقي گلرخ بياور باده رنگين که فکري در درون ما از اين بهتر نمي گيرد صراحي مي کشم پنهان و مردم دفتر انگارند عجب گر آتش اين زرق در دفتر نمي گيرد من اين دلق مرقع را بخواهم سوختن روزي که پير مي فروشانش به جامي بر نمي گيرد از آن رو هست ياران را صفاها با مي لعلش که غير از راستي نقشي در آن جوهر نمي گيرد سر و چشمي چنين دلکش تو گويي چشم از او بردوز برو کاين وعظ بي معني مرا در سر نمي گيرد نصيحتگوي رندان را که با حکم قضا جنگ است دلش بس تنگ مي بينم مگر ساغر نمي گيرد ميان گريه مي خندم که چون شمع اندر اين مجلس زبان آتشينم هست ليکن در نمي گيرد چه خوش صيد دلم کردي بنازم چشم مستت را که کس مرغان وحشي را از اين خوشتر نمي گيرد سخن در احتياج ما و استغناي معشوق است چه سود افسونگري اي دل که در دلبر نمي گيرد من آن آيينه را روزي به دست آرم سکندروار اگر مي گيرد اين آتش زماني ور نمي گيرد خدا را رحمي اي منعم که درويش سر کويت دري ديگر نمي داند رهي ديگر نمي گيرد بدين شعر تر شيرين ز شاهنشه عجب دارم که سر تا پاي حافظ را چرا در زر نمي گيرد
----------------------------------------------------
۱۵۰
ساقي ار باده از اين دست به جام اندازد ---------------------------------------------------- ۱۵۱
دمي با غم به سر بردن جهان يک سر نمي ارزد ---------------------------------------------------- ۱۵۲
در ازل پرتو حسنت ز تجلي دم زد ---------------------------------------------------- ۱۵۳
سحر چون خسرو خاور علم بر کوهساران زد ---------------------------------------------------- ۱۵۴
راهي بزن که آهي بر ساز آن توان زد ----------------------------------------------------
۱۵۵
اگر روم ز پي اش فتنه ها برانگيزد ---------------------------------------------------- ۱۵۶
به حسن و خلق و وفا کس به يار ما نرسد ---------------------------------------------------- ۱۵۷
هر که را با خط سبزت سر سودا باشد ---------------------------------------------------- ۱۵۸
من و انکار شراب اين چه حکايت باشد ---------------------------------------------------- ۱۵۹
نقد صوفي نه همه صافي بي غش باشد ----------------------------------------------------
۱۶۰ خوش است خلوت اگر يار يار من باشد ---------------------------------------------------- ۱۶۱
کي شعر تر انگيزد خاطر که حزين باشد ---------------------------------------------------- ۱۶۲
خوش آمد گل وز آن خوشتر نباشد ---------------------------------------------------- ۱۶۳
گل بي رخ يار خوش نباشد ---------------------------------------------------- ۱۶۴
نفس باد صبا مشک فشان خواهد شد ----------------------------------------------------
۱۶۵
مرا مهر سيه چشمان ز سر بيرون نخواهد شد ---------------------------------------------------- ۱۶۶
روز هجران و شب فرقت يار آخر شد ---------------------------------------------------- ۱۶۷
ستاره اي بدرخشيد و ماه مجلس شد ---------------------------------------------------- ۱۶۸
گداخت جان که شود کار دل تمام و نشد ---------------------------------------------------- ۱۶۹
ياري اندر کس نمي بينيم ياران را چه شد ----------------------------------------------------
۱۷۰
زاهد خلوت نشين دوش به ميخانه شد ---------------------------------------------------- ۱۷۱
دوش از جناب آصف پيک بشارت آمد ---------------------------------------------------- ۱۷۲
عشق تو نهال حيرت آمد ---------------------------------------------------- ۱۷۳
در نمازم خم ابروي تو با ياد آمد ---------------------------------------------------- ۱۷۴
مژده اي دل که دگر باد صبا بازآمد ----------------------------------------------------
۱۷۵
صبا به تهنيت پير مي فروش آمد ---------------------------------------------------- ۱۷۶
سحرم دولت بيدار به بالين آمد ---------------------------------------------------- ۱۷۷
نه هر که چهره برافروخت دلبري داند ---------------------------------------------------- ۱۷۸
هر که شد محرم دل در حرم يار بماند ---------------------------------------------------- ۱۷۹
رسيد مژده که ايام غم نخواهد ماند ----------------------------------------------------
۱۸۰
اي پسته تو خنده زده بر حديث قند ---------------------------------------------------- ۱۸۱
بعد از اين دست من و دامن آن سرو بلند ---------------------------------------------------- ۱۸۲
حسب حالي ننوشتي و شد ايامي چند ---------------------------------------------------- ۱۸۳
دوش وقت سحر از غصه نجاتم دادند ---------------------------------------------------- ۱۸۴
دوش ديدم که ملايک در ميخانه زدند ----------------------------------------------------
۱۸۵
نقدها را بود آيا که عياري گيرند ---------------------------------------------------- ۱۸۶
گر مي فروش حاجت رندان روا کند ---------------------------------------------------- ۱۸۷
دلا بسوز که سوز تو کارها بکند ---------------------------------------------------- ۱۸۸
مرا به رندي و عشق آن فضول عيب کند ---------------------------------------------------- ۱۸۹
طاير دولت اگر باز گذاري بکند ----------------------------------------------------
۱۹۰
کلک مشکين تو روزي که ز ما ياد کند ---------------------------------------------------- ۱۹۱
آن کيست کز روي کرم با ما وفاداري کند ---------------------------------------------------- ۱۹۲
سرو چمان من چرا ميل چمن نمي کند ---------------------------------------------------- ۱۹۳
در نظربازي ما بي خبران حيرانند ---------------------------------------------------- ۱۹۴
سمن بويان غبار غم چو بنشينند بنشانند ----------------------------------------------------
۱۹۵
غلام نرگس مست تو تاجدارانند ---------------------------------------------------- ۱۹۶
آنان که خاک را به نظر کيميا کنند ---------------------------------------------------- ۱۹۷
شاهدان گر دلبري زين سان کنند ---------------------------------------------------- ۱۹۸
گفتم کي ام دهان و لبت کامران کنند ---------------------------------------------------- ۱۹۹
واعظان کاين جلوه در محراب و منبر مي کنند ---------------------------------------------------- ۲۰۰
داني که چنگ و عود چه تقرير مي کنند
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نوشته شده در دوشنبه یازدهم مرداد ۱۳۸۹ساعت 23:0 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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غزلیات حافظ از ۲۰۱ تا ۳۰۰
۲۰۱
شراب بي غش و ساقي خوش دو دام رهند ---------------------------------------------------- ۲۰۲
بود آيا که در ميکده ها بگشايند ---------------------------------------------------- ۲۰۳
سال ها دفتر ما در گرو صهبا بود ---------------------------------------------------- ۲۰۴
ياد باد آن که نهانت نظري با ما بود ---------------------------------------------------- ۲۰۵
تا ز ميخانه و مي نام و نشان خواهد بود ---------------------------------------------------- ۲۰۶
پيش از اينت بيش از اين انديشه عشاق بود ---------------------------------------------------- ۲۰۷
ياد باد آن که سر کوي توام منزل بود ---------------------------------------------------- ۲۰۸
خستگان را چو طلب باشد و قوت نبود ---------------------------------------------------- ۲۰۹
قتل اين خسته به شمشير تو تقدير نبود ---------------------------------------------------- ۲۱۰
دوش در حلقه ما قصه گيسوي تو بود ---------------------------------------------------- ۲۱۱
دوش مي آمد و رخساره برافروخته بود ---------------------------------------------------- ۲۱۲
يک دو جامم دي سحرگه اتفاق افتاده بود ---------------------------------------------------- ۲۱۳
گوهر مخزن اسرار همان است که بود ---------------------------------------------------- ۲۱۴
ديدم به خواب خوش که به دستم پياله بود ---------------------------------------------------- ۲۱۵
به کوي ميکده يا رب سحر چه مشغله بود ---------------------------------------------------- ۲۱۶
آن يار کز او خانه ما جاي پري بود ---------------------------------------------------- ۲۱۷
مسلمانان مرا وقتي دلي بود ---------------------------------------------------- ۲۱۸
در ازل هر کو به فيض دولت ارزاني بود ---------------------------------------------------- ۲۱۹
کنون که در چمن آمد گل از عدم به وجود ---------------------------------------------------- ۲۲۰
از ديده خون دل همه بر روي ما رود ---------------------------------------------------- ۲۲۱
چو دست بر سر زلفش زنم به تاب رود ---------------------------------------------------- ۲۲۲
از سر کوي تو هر کو به ملالت برود ---------------------------------------------------- ۲۲۳
هرگزم نقش تو از لوح دل و جان نرود ---------------------------------------------------- ۲۲۴
خوشا دلي که مدام از پي نظر نرود ---------------------------------------------------- ۲۲۵
ساقي حديث سرو و گل و لاله مي رود ---------------------------------------------------- ۲۲۶
ترسم که اشک در غم ما پرده در شود ---------------------------------------------------- ۲۲۷
گر چه بر واعظ شهر اين سخن آسان نشود ---------------------------------------------------- ۲۲۸
گر من از باغ تو يک ميوه بچينم چه شود ---------------------------------------------------- ۲۲۹
بخت از دهان دوست نشانم نمي دهد ---------------------------------------------------- ۲۳۰
اگر به باده مشکين دلم کشد شايد ---------------------------------------------------- ۲۳۱
گفتم غم تو دارم گفتا غمت سر آيد ---------------------------------------------------- ۲۳۲
بر سر آنم که گر ز دست برآيد ---------------------------------------------------- ۲۳۳
دست از طلب ندارم تا کام من برآيد
---------------------------------------------------- ۲۳۴
چو آفتاب مي از مشرق پياله برآيد ---------------------------------------------------- ۲۳۵
زهي خجسته زماني که يار بازآيد ---------------------------------------------------- ۲۳۶
اگر آن طاير قدسي ز درم بازآيد ---------------------------------------------------- ۲۳۷
نفس برآمد و کام از تو بر نمي آيد ---------------------------------------------------- ۲۳۸
جهان بر ابروي عيد از هلال وسمه کشيد ---------------------------------------------------- ۲۳۹
رسيد مژده که آمد بهار و سبزه دميد ---------------------------------------------------- ۲۴۰
ابر آذاري برآمد باد نوروزي وزيد ---------------------------------------------------- ۲۴۱
معاشران ز حريف شبانه ياد آريد ---------------------------------------------------- ۲۴۲
بيا که رايت منصور پادشاه رسيد ---------------------------------------------------- ۲۴۳
بوي خوش تو هر که ز باد صبا شنيد ---------------------------------------------------- ۲۴۴
معاشران گره از زلف يار باز کنيد ---------------------------------------------------- ۲۴۵
الا اي طوطي گوياي اسرار ---------------------------------------------------- ۲۴۶
عيد است و آخر گل و ياران در انتظار ---------------------------------------------------- ۲۴۷
صبا ز منزل جانان گذر دريغ مدار ---------------------------------------------------- ۲۴۸
اي صبا نکهتي از کوي فلاني به من آر ---------------------------------------------------- ۲۴۹
اي صبا نکهتي از خاک ره يار بيار ---------------------------------------------------- ۲۵۰
روي بنماي و وجود خودم از ياد ببر ---------------------------------------------------- ۲۵۱
شب وصل است و طي شد نامه هجر ---------------------------------------------------- ۲۵۲
گر بود عمر به ميخانه رسم بار دگر ---------------------------------------------------- ۲۵۳
اي خرم از فروغ رخت لاله زار عمر ---------------------------------------------------- ۲۵۴
ديگر ز شاخ سرو سهي بلبل صبور ---------------------------------------------------- ۲۵۵
يوسف گمگشته بازآيد به کنعان غم مخور ---------------------------------------------------- ۲۵۶
نصيحتي کنمت بشنو و بهانه مگير ---------------------------------------------------- ۲۵۷
روي بنما و مرا گو که ز جان دل برگير ---------------------------------------------------- ۲۵۸
هزار شکر که ديدم به کام خويشت باز ---------------------------------------------------- ۲۵۹
منم که ديده به ديدار دوست کردم باز ---------------------------------------------------- ۲۶۰
اي سرو ناز حسن که خوش مي روي به ناز ---------------------------------------------------- ۲۶۱
درآ که در دل خسته توان درآيد باز ---------------------------------------------------- ۲۶۲
حال خونين دلان که گويد باز ---------------------------------------------------- ۲۶۳
بيا و کشتي ما در شط شراب انداز ---------------------------------------------------- ۲۶۴
خيز و در کاسه زر آب طربناک انداز ---------------------------------------------------- ۲۶۵
برنيامد از تمناي لبت کامم هنوز ---------------------------------------------------- ۲۶۶
دلم رميده لولي وشيست شورانگيز ---------------------------------------------------- ۲۶۷
اي صبا گر بگذري بر ساحل رود ارس ---------------------------------------------------- ۲۶۸
گلعذاري ز گلستان جهان ما را بس ---------------------------------------------------- ۲۶۹
دلا رفيق سفر بخت نيکخواهت بس ---------------------------------------------------- ۲۷۰
درد عشقي کشيده ام که مپرس ---------------------------------------------------- ۲۷۱
دارم از زلف سياهش گله چندان که مپرس ---------------------------------------------------- ۲۷۲
بازآي و دل تنگ مرا مونس جان باش ---------------------------------------------------- ۲۷۳
اگر رفيق شفيقي درست پيمان باش ---------------------------------------------------- ۲۷۴
به دور لاله قدح گير و بي ريا مي باش ---------------------------------------------------- ۲۷۵
صوفي گلي بچين و مرقع به خار بخش ---------------------------------------------------- ۲۷۶
باغبان گر پنج روزي صحبت گل بايدش ---------------------------------------------------- ۲۷۷
فکر بلبل همه آن است که گل شد يارش ---------------------------------------------------- ۲۷۸
شراب تلخ مي خواهم که مردافکن بود زورش ---------------------------------------------------- ۲۷۹
خوشا شيراز و وضع بي مثالش ---------------------------------------------------- ۲۸۰
چو برشکست صبا زلف عنبرافشانش ---------------------------------------------------- ۲۸۱
يا رب اين نوگل خندان که سپردي به منش ---------------------------------------------------- ۲۸۲
ببرد از من قرار و طاقت و هوش ---------------------------------------------------- ۲۸۳
سحر ز هاتف غيبم رسيد مژده به گوش ---------------------------------------------------- ۲۸۴
هاتفي از گوشه ميخانه دوش ---------------------------------------------------- ۲۸۵
در عهد پادشاه خطابخش جرم پوش ---------------------------------------------------- ۲۸۶
دوش با من گفت پنهان کارداني تيزهوش ---------------------------------------------------- ۲۸۷
اي همه شکل تو مطبوع و همه جاي تو خوش ---------------------------------------------------- ۲۸۸
کنار آب و پاي بيد و طبع شعر و ياري خوش ---------------------------------------------------- ۲۸۹
مجمع خوبي و لطف است عذار چو مهش ---------------------------------------------------- ۲۹۰
دلم رميده شد و غافلم من درويش ---------------------------------------------------- ۲۹۱
ما آزموده ايم در اين شهر بخت خويش ---------------------------------------------------- ۲۹۲
قسم به حشمت و جاه و جلال شاه شجاع ---------------------------------------------------- ۲۹۳
بامدادان که ز خلوتگه کاخ ابداع ---------------------------------------------------- ۲۹۴
در وفاي عشق تو مشهور خوبانم چو شمع ---------------------------------------------------- ۲۹۵
سحر به بوي گلستان دمي شدم در باغ ---------------------------------------------------- ۲۹۶
طالع اگر مدد دهد دامنش آورم به کف ---------------------------------------------------- ۲۹۷
زبان خامه ندارد سر بيان فراق ---------------------------------------------------- ۲۹۸
مقام امن و مي بي غش و رفيق شفيق ---------------------------------------------------- ۲۹۹
اگر شراب خوري جرعه اي فشان بر خاک ---------------------------------------------------- ۳۰۰
هزار دشمنم ار مي کنند قصد هلاک
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نوشته شده در دوشنبه یازدهم مرداد ۱۳۸۹ساعت 22:49 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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غزلیات حافظ از ۱ تا ۱۰۰
۱ الا يا ايها الساقي ادر کاسا و ناولها که عشق آسان نمود اول ولي افتاد مشکل ها به بوي نافه اي کاخر صبا زان طره بگشايد ز تاب جعد مشکينش چه خون افتاد در دل ها مرا در منزل جانان چه امن عيش چون هر دم جرس فرياد مي دارد که بربنديد محمل ها به مي سجاده رنگين کن گرت پير مغان گويد که سالک بي خبر نبود ز راه و رسم منزل ها شب تاريک و بيم موج و گردابي چنين هايل کجا دانند حال ما سبکباران ساحل ها همه کارم ز خود کامي به بدنامي کشيد آخر نهان کي ماند آن رازي کز او سازند محفل ها حضوري گر همي خواهي از او غايب مشو حافظ متي ما تلق من تهوي دع الدنيا و اهملها ----------------------------------------- ۲
صلاح کار کجا و من خراب کجا ----------------------------------------- ۳
اگر آن ترک شيرازي به دست آرد دل ما را ----------------------------------------- ۴
صبا به لطف بگو آن غزال رعنا را -----------------------------------------
۵
دل مي رود ز دستم صاحب دلان خدا را ----------------------------------------- ۶
به ملازمان سلطان که رساند اين دعا را ----------------------------------------- ۷
صوفي بيا که آينه صافيست جام را ----------------------------------------- ۸
ساقيا برخيز و درده جام را ----------------------------------------- ۹
رونق عهد شباب است دگر بستان را -----------------------------------------
۱۰
دوش از مسجد سوي ميخانه آمد پير ما ----------------------------------------- ۱۱
ساقي به نور باده برافروز جام ما ----------------------------------------- ۱۲
اي فروغ ماه حسن از روي رخشان شما ----------------------------------------- ۱۳
مي دمد صبح و کله بست سحاب ----------------------------------------- ۱۴ گفتم اي سلطان خوبان رحم کن بر اين غريب گفت در دنبال دل ره گم کند مسکين غريب گفتمش مگذر زماني گفت معذورم بدار خانه پروردي چه تاب آرد غم چندين غريب خفته بر سنجاب شاهي نازنيني را چه غم گر ز خار و خاره سازد بستر و بالين غريب اي که در زنجير زلفت جاي چندين آشناست خوش فتاد آن خال مشکين بر رخ رنگين غريب مي نمايد عکس مي در رنگ روي مه وشت همچو برگ ارغوان بر صفحه نسرين غريب بس غريب افتاده است آن مور خط گرد رخت گر چه نبود در نگارستان خط مشکين غريب گفتم اي شام غريبان طره شبرنگ تو در سحرگاهان حذر کن چون بنالد اين غريب گفت حافظ آشنايان در مقام حيرتند دور نبود گر نشيند خسته و مسکين غريب
-----------------------------------------
۱۵
اي شاهد قدسي که کشد بند نقابت ----------------------------------------- ۱۶
خمي که ابروي شوخ تو در کمان انداخت
---------------------------------------
سينه از آتش دل در غم جانانه بسوخت
---------------------------------------
ساقيا آمدن عيد مبارک بادت
--------------------------------------- ۱۹
اي نسيم سحر آرامگه يار کجاست ---------------------------------------
۲۰
روزه يک سو شد و عيد آمد و دل ها برخاست
--------------------------------------- ۲۱
دل و دينم شد و دلبر به ملامت برخاست --------------------------------------- ۲۲
چو بشنوي سخن اهل دل مگو که خطاست ---------------------------------------
خيال روي تو در هر طريق همره ماست --------------------------------------- ۲۴
مطلب طاعت و پيمان و صلاح از من مست ---------------------------------------
۲۵
شکفته شد گل حمرا و گشت بلبل مست --------------------------------------- ۲۶
زلف آشفته و خوي کرده و خندان لب و مست
--------------------------------------- ۲۷ در دير مغان آمد يارم قدحي در دست مست از مي و ميخواران از نرگس مستش مست در نعل سمند او شکل مه نو پيدا وز قد بلند او بالاي صنوبر پست آخر به چه گويم هست از خود خبرم چون نيست وز بهر چه گويم نيست با وي نظرم چون هست شمع دل دمسازم بنشست چو او برخاست و افغان ز نظربازان برخاست چو او بنشست گر غاليه خوش بو شد در گيسوي او پيچيد ور وسمه کمانکش گشت در ابروي او پيوست بازآي که بازآيد عمر شده حافظ هر چند که نايد باز تيري که بشد از شست
۲۸ به جان خواجه و حق قديم و عهد درست که مونس دم صبحم دعاي دولت توست سرشک من که ز طوفان نوح دست برد ز لوح سينه نيارست نقش مهر تو شست بکن معامله اي وين دل شکسته بخر که با شکستگي ارزد به صد هزار درست زبان مور به آصف دراز گشت و رواست که خواجه خاتم جم ياوه کرد و بازنجست دلا طمع مبر از لطف بي نهايت دوست چو لاف عشق زدي سر بباز چابک و چست به صدق کوش که خورشيد زايد از نفست که از دروغ سيه روي گشت صبح نخست شدم ز دست تو شيداي کوه و دشت و هنوز نمي کني به ترحم نطاق سلسله سست مرنج حافظ و از دلبران حفاظ مجوي گناه باغ چه باشد چو اين گياه نرست
--------------------------------------- ۲۹ ما را ز خيال تو چه پرواي شراب است خم گو سر خود گير که خمخانه خراب است گر خمر بهشت است بريزيد که بي دوست هر شربت عذبم که دهي عين عذاب است افسوس که شد دلبر و در ديده گريان تحرير خيال خط او نقش بر آب است بيدار شو اي ديده که ايمن نتوان بود زين سيل دمادم که در اين منزل خواب است معشوق عيان مي گذرد بر تو وليکن اغيار همي بيند از آن بسته نقاب است گل بر رخ رنگين تو تا لطف عرق ديد در آتش شوق از غم دل غرق گلاب است سبز است در و دشت بيا تا نگذاريم دست از سر آبي که جهان جمله سراب است در کنج دماغم مطلب جاي نصيحت کاين گوشه پر از زمزمه چنگ و رباب است حافظ چه شد ار عاشق و رند است و نظرباز بس طور عجب لازم ايام شباب است
---------------------------------------
۳۰
زلفت هزار دل به يکي تار مو ببست --------------------------------------- ۳۱ آن شب قدري که گويند اهل خلوت امشب است يا رب اين تاثير دولت در کدامين کوکب است تا به گيسوي تو دست ناسزايان کم رسد هر دلي از حلقه اي در ذکر يارب يارب است کشته چاه زنخدان توام کز هر طرف صد هزارش گردن جان زير طوق غبغب است شهسوار من که مه آيينه دار روي اوست تاج خورشيد بلندش خاک نعل مرکب است عکس خوي بر عارضش بين کآفتاب گرم رو در هواي آن عرق تا هست هر روزش تب است من نخواهم کرد ترک لعل يار و جام مي زاهدان معذور داريدم که اينم مذهب است اندر آن ساعت که بر پشت صبا بندند زين با سليمان چون برانم من که مورم مرکب است آن که ناوک بر دل من زير چشمي مي زند قوت جان حافظش در خنده زير لب است آب حيوانش ز منقار بلاغت مي چکد زاغ کلک من به نام ايزد چه عالي مشرب است
--------------------------------------- ۳۲
خدا چو صورت ابروي دلگشاي تو بست ۳۳ خلوت گزيده را به تماشا چه حاجت است چون کوي دوست هست به صحرا چه حاجت است جانا به حاجتي که تو را هست با خدا کآخر دمي بپرس که ما را چه حاجت است اي پادشاه حسن خدا را بسوختيم آخر سوال کن که گدا را چه حاجت است ارباب حاجتيم و زبان سوال نيست در حضرت کريم تمنا چه حاجت است محتاج قصه نيست گرت قصد خون ماست چون رخت از آن توست به يغما چه حاجت است جام جهان نماست ضمير منير دوست اظهار احتياج خود آن جا چه حاجت است آن شد که بار منت ملاح بردمي گوهر چو دست داد به دريا چه حاجت است اي مدعي برو که مرا با تو کار نيست احباب حاضرند به اعدا چه حاجت است اي عاشق گدا چو لب روح بخش يار مي داندت وظيفه تقاضا چه حاجت است حافظ تو ختم کن که هنر خود عيان شود با مدعي نزاع و محاکا چه حاجت است
--------------------------------------- ۳۴ رواق منظر چشم من آشيانه توست کرم نما و فرود آ که خانه خانه توست به لطف خال و خط از عارفان ربودي دل لطيفه هاي عجب زير دام و دانه توست دلت به وصل گل اي بلبل صبا خوش باد که در چمن همه گلبانگ عاشقانه توست علاج ضعف دل ما به لب حوالت کن که اين مفرح ياقوت در خزانه توست به تن مقصرم از دولت ملازمتت ولي خلاصه جان خاک آستانه توست من آن نيم که دهم نقد دل به هر شوخي در خزانه به مهر تو و نشانه توست تو خود چه لعبتي اي شهسوار شيرين کار که توسني چو فلک رام تازيانه توست چه جاي من که بلغزد سپهر شعبده باز از اين حيل که در انبانه بهانه توست سرود مجلست اکنون فلک به رقص آرد که شعر حافظ شيرين سخن ترانه توست
---------------------------------------
۳۵
برو به کار خود اي واعظ اين چه فريادست --------------------------------------- ۳۶
تا سر زلف تو در دست نسيم افتادست
۳۷
بيا که قصر امل سخت سست بنيادست --------------------------------------- ۳۸ بي مهر رخت روز مرا نور نماندست وز عمر مرا جز شب ديجور نماندست هنگام وداع تو ز بس گريه که کردم دور از رخ تو چشم مرا نور نماندست مي رفت خيال تو ز چشم من و مي گفت هيهات از اين گوشه که معمور نماندست وصل تو اجل را ز سرم دور همي داشت از دولت هجر تو کنون دور نماندست نزديک شد آن دم که رقيب تو بگويد دور از رخت اين خسته رنجور نماندست صبر است مرا چاره هجران تو ليکن چون صبر توان کرد که مقدور نماندست در هجر تو گر چشم مرا آب روان است گو خون جگر ريز که معذور نماندست حافظ ز غم از گريه نپرداخت به خنده ماتم زده را داعيه سور نماندست
--------------------------------------- ۳۹
باغ مرا چه حاجت سرو و صنوبر است
۴۰ المنه لله که در ميکده باز است --------------------------------------- ۴۱
اگر چه باده فرح بخش و باد گل بيز است ۴۲ حال دل با تو گفتنم هوس است خبر دل شنفتنم هوس است طمع خام بين که قصه فاش از رقيبان نهفتنم هوس است شب قدري چنين عزيز و شريف با تو تا روز خفتنم هوس است وه که دردانه اي چنين نازک در شب تار سفتنم هوس است اي صبا امشبم مدد فرماي که سحرگه شکفتنم هوس است از براي شرف به نوک مژه خاک راه تو رفتنم هوس است همچو حافظ به رغم مدعيان شعر رندانه گفتنم هوس است
--------------------------------------- ۴۳ صحن بستان ذوق بخش و صحبت ياران خوش است وقت گل خوش باد کز وي وقت ميخواران خوش است از صبا هر دم مشام جان ما خوش مي شود آري آري طيب انفاس هواداران خوش است ناگشوده گل نقاب آهنگ رحلت ساز کرد ناله کن بلبل که گلبانگ دل افکاران خوش است مرغ خوشخوان را بشارت باد کاندر راه عشق دوست را با ناله شب هاي بيداران خوش است نيست در بازار عالم خوشدلي ور زان که هست شيوه رندي و خوش باشي عياران خوش است از زبان سوسن آزاده ام آمد به گوش کاندر اين دير کهن کار سبکباران خوش است حافظا ترک جهان گفتن طريق خوشدليست تا نپنداري که احوال جهان داران خوش است
--------------------------------------- ۴۴ کنون که بر کف گل جام باده صاف است به صد هزار زبان بلبلش در اوصاف است بخواه دفتر اشعار و راه صحرا گير چه وقت مدرسه و بحث کشف کشاف است فقيه مدرسه دي مست بود و فتوي داد که مي حرام ولي به ز مال اوقاف است به درد و صاف تو را حکم نيست خوش درکش که هر چه ساقي ما کرد عين الطاف است ببر ز خلق و چو عنقا قياس کار بگير که صيت گوشه نشينان ز قاف تا قاف است حديث مدعيان و خيال همکاران همان حکايت زردوز و بورياباف است خموش حافظ و اين نکته هاي چون زر سرخ نگاه دار که قلاب شهر صراف است
---------------------------------------
۴۵
در اين زمانه رفيقي که خالي از خلل است --------------------------------------- ۴۶ گل در بر و مي در کف و معشوق به کام است سلطان جهانم به چنين روز غلام است گو شمع مياريد در اين جمع که امشب در مجلس ما ماه رخ دوست تمام است در مذهب ما باده حلال است وليکن بي روي تو اي سرو گل اندام حرام است گوشم همه بر قول ني و نغمه چنگ است چشمم همه بر لعل لب و گردش جام است در مجلس ما عطر مياميز که ما را هر لحظه ز گيسوي تو خوش بوي مشام است از چاشني قند مگو هيچ و ز شکر زان رو که مرا از لب شيرين تو کام است تا گنج غمت در دل ويرانه مقيم است همواره مرا کوي خرابات مقام است از ننگ چه گويي که مرا نام ز ننگ است وز نام چه پرسي که مرا ننگ ز نام است ميخواره و سرگشته و رنديم و نظرباز وان کس که چو ما نيست در اين شهر کدام است با محتسبم عيب مگوييد که او نيز پيوسته چو ما در طلب عيش مدام است حافظ منشين بي مي و معشوق زماني کايام گل و ياسمن و عيد صيام است
--------------------------------------- ۴۷ به کوي ميکده هر سالکي که ره دانست دري دگر زدن انديشه تبه دانست زمانه افسر رندي نداد جز به کسي که سرفرازي عالم در اين کله دانست بر آستانه ميخانه هر که يافت رهي ز فيض جام مي اسرار خانقه دانست هر آن که راز دو عالم ز خط ساغر خواند رموز جام جم از نقش خاک ره دانست وراي طاعت ديوانگان ز ما مطلب که شيخ مذهب ما عاقلي گنه دانست دلم ز نرگس ساقي امان نخواست به جان چرا که شيوه آن ترک دل سيه دانست ز جور کوکب طالع سحرگهان چشمم چنان گريست که ناهيد ديد و مه دانست حديث حافظ و ساغر که مي زند پنهان چه جاي محتسب و شحنه پادشه دانست بلندمرتبه شاهي که نه رواق سپهر نمونه اي ز خم طاق بارگه دانست
--------------------------------------- ۴۸ صوفي از پرتو مي راز نهاني دانست گوهر هر کس از اين لعل تواني دانست قدر مجموعه گل مرغ سحر داند و بس که نه هر کو ورقي خواند معاني دانست عرضه کردم دو جهان بر دل کارافتاده بجز از عشق تو باقي همه فاني دانست آن شد اکنون که ز ابناي عوام انديشم محتسب نيز در اين عيش نهاني دانست دلبر آسايش ما مصلحت وقت نديد ور نه از جانب ما دل نگراني دانست سنگ و گل را کند از يمن نظر لعل و عقيق هر که قدر نفس باد يماني دانست اي که از دفتر عقل آيت عشق آموزي ترسم اين نکته به تحقيق نداني دانست مي بياور که ننازد به گل باغ جهان هر که غارتگري باد خزاني دانست حافظ اين گوهر منظوم که از طبع انگيخت ز اثر تربيت آصف ثاني دانست
--------------------------------------- ۴۹
روضه خلد برين خلوت درويشان است
---------------------------------------
۵۰ به دام زلف تو دل مبتلاي خويشتن است بکش به غمزه که اينش سزاي خويشتن است گرت ز دست برآيد مراد خاطر ما به دست باش که خيري به جاي خويشتن است به جانت اي بت شيرين دهن که همچون شمع شبان تيره مرادم فناي خويشتن است چو راي عشق زدي با تو گفتم اي بلبل مکن که آن گل خندان براي خويشتن است به مشک چين و چگل نيست بوي گل محتاج که نافه هاش ز بند قباي خويشتن است مرو به خانه ارباب بي مروت دهر که گنج عافيتت در سراي خويشتن است بسوخت حافظ و در شرط عشقبازي او هنوز بر سر عهد و وفاي خويشتن است --------------------------------------- ۵۱
لعل سيراب به خون تشنه لب يار من است ۵۲ روزگاريست که سوداي بتان دين من است غم اين کار نشاط دل غمگين من است ديدن روي تو را ديده جان بين بايد وين کجا مرتبه چشم جهان بين من است يار من باش که زيب فلک و زينت دهر از مه روي تو و اشک چو پروين من است تا مرا عشق تو تعليم سخن گفتن کرد خلق را ورد زبان مدحت و تحسين من است دولت فقر خدايا به من ارزاني دار کاين کرامت سبب حشمت و تمکين من است واعظ شحنه شناس اين عظمت گو مفروش زان که منزلگه سلطان دل مسکين من است يا رب اين کعبه مقصود تماشاگه کيست که مغيلان طريقش گل و نسرين من است حافظ از حشمت پرويز دگر قصه مخوان که لبش جرعه کش خسرو شيرين من است --------------------------------------- ۵۳ منم که گوشه ميخانه خانقاه من است دعاي پير مغان ورد صبحگاه من است گرم ترانه چنگ صبوح نيست چه باک نواي من به سحر آه عذرخواه من است ز پادشاه و گدا فارغم بحمدالله گداي خاک در دوست پادشاه من است غرض ز مسجد و ميخانه ام وصال شماست جز اين خيال ندارم خدا گواه من است مگر به تيغ اجل خيمه برکنم ور ني رميدن از در دولت نه رسم و راه من است از آن زمان که بر اين آستان نهادم روي فراز مسند خورشيد تکيه گاه من است گناه اگر چه نبود اختيار ما حافظ تو در طريق ادب باش و گو گناه من است --------------------------------------- ۵۴ ز گريه مردم چشمم نشسته در خون است ببين که در طلبت حال مردمان چون است به ياد لعل تو و چشم مست ميگونت ز جام غم مي لعلي که مي خورم خون است ز مشرق سر کو آفتاب طلعت تو اگر طلوع کند طالعم همايون است حکايت لب شيرين کلام فرهاد است شکنج طره ليلي مقام مجنون است دلم بجو که قدت همچو سرو دلجوي است سخن بگو که کلامت لطيف و موزون است ز دور باده به جان راحتي رسان ساقي که رنج خاطرم از جور دور گردون است از آن دمي که ز چشمم برفت رود عزيز کنار دامن من همچو رود جيحون است چگونه شاد شود اندرون غمگينم به اختيار که از اختيار بيرون است ز بيخودي طلب يار مي کند حافظ چو مفلسي که طلبکار گنج قارون است
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۵۵
خم زلف تو دام کفر و دين است
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دل سراپرده محبت اوست ۵۷
آن سيه چرده که شيريني عالم با اوست ---------------------------------------------------- ۵۸
سر ارادت ما و آستان حضرت دوست ---------------------------------------------------- ۵۹
دارم اميد عاطفتي از جانب دوست ----------------------------------------------------
۶۰
آن پيک نامور که رسيد از ديار دوست ---------------------------------------------------- ۶۱
صبا اگر گذري افتدت به کشور دوست ---------------------------------------------------- ۶۲
مرحبا اي پيک مشتاقان بده پيغام دوست ---------------------------------------------------- ۶۳
روي تو کس نديد و هزارت رقيب هست ---------------------------------------------------- ۶۴
اگر چه عرض هنر پيش يار بي ادبيست ----------------------------------------------------
۶۵
خوشتر ز عيش و صحبت و باغ و بهار چيست ---------------------------------------------------- ۶۶
بنال بلبل اگر با منت سر ياريست ---------------------------------------------------- ۶۷
يا رب اين شمع دل افروز ز کاشانه کيست ---------------------------------------------------- ۶۸
ماهم اين هفته برون رفت و به چشمم ساليست ---------------------------------------------------- ۶۹
کس نيست که افتاده آن زلف دوتا نيست ----------------------------------------------------
۷۰
مردم ديده ما جز به رخت ناظر نيست ---------------------------------------------------- ۷۱
زاهد ظاهرپرست از حال ما آگاه نيست ---------------------------------------------------- ۷۲
راهيست راه عشق که هيچش کناره نيست ---------------------------------------------------- ۷۳
روشن از پرتو رويت نظري نيست که نيست ---------------------------------------------------- ۷۴
حاصل کارگه کون و مکان اين همه نيست ----------------------------------------------------
۷۵
خواب آن نرگس فتان تو بي چيزي نيست ---------------------------------------------------- ۷۶
جز آستان توام در جهان پناهي نيست ---------------------------------------------------- ۷۷
بلبلي برگ گلي خوش رنگ در منقار داشت ---------------------------------------------------- ۷۸
ديدي که يار جز سر جور و ستم نداشت ---------------------------------------------------- ۷۹
کنون که مي دمد از بوستان نسيم بهشت ----------------------------------------------------
۸۰
عيب رندان مکن اي زاهد پاکيزه سرشت ---------------------------------------------------- ۸۱
صبحدم مرغ چمن با گل نوخاسته گفت ---------------------------------------------------- ۸۲
آن ترک پري چهره که دوش از بر ما رفت ---------------------------------------------------- ۸۳
گر ز دست زلف مشکينت خطايي رفت رفت ---------------------------------------------------- ۸۴
ساقي بيار باده که ماه صيام رفت ----------------------------------------------------
۸۵
شربتي از لب لعلش نچشيديم و برفت ---------------------------------------------------- ۸۶
ساقي بيا که يار ز رخ پرده برگرفت ---------------------------------------------------- ۸۷
حسنت به اتفاق ملاحت جهان گرفت ---------------------------------------------------- ۸۸
شنيده ام سخني خوش که پير کنعان گفت ---------------------------------------------------- ۸۹
يا رب سببي ساز که يارم به سلامت ----------------------------------------------------
۹۰
اي هدهد صبا به سبا مي فرستمت ---------------------------------------------------- ۹۱
اي غايب از نظر به خدا مي سپارمت ---------------------------------------------------- ۹۲
مير من خوش مي روي کاندر سر و پا ميرمت ---------------------------------------------------- ۹۳
چه لطف بود که ناگاه رشحه قلمت ---------------------------------------------------- ۹۴
زان يار دلنوازم شکريست با شکايت ----------------------------------------------------
۹۵
مدامم مست مي دارد نسيم جعد گيسويت ---------------------------------------------------- ۹۶
درد ما را نيست درمان الغياث ---------------------------------------------------- ۹۷
تويي که بر سر خوبان کشوري چون تاج ---------------------------------------------------- ۹۸
اگر به مذهب تو خون عاشق است مباح ---------------------------------------------------- ۹۹
دل من در هواي روي فرخ ---------------------------------------------------- ۱۰۰
دي پير مي فروش که ذکرش به خير باد
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نوشته شده در دوشنبه یازدهم مرداد ۱۳۸۹ساعت 22:0 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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بابک خرمدین زنده است
![]() پیشگویان به بابک خرمدین ، آزادیخواه میهن پرست کشورمان گفتند در پایان این مبارزه کشته خواهی شد او گفت سالها پیش از خود گذشتم همانگونه که ابومسلم خراسانی از خود گذشت برای این که ایران دوباره ادامه زندگی پیدا کند روح بزرگانی همچون ابومسلم در من فریاد می کشد و به من انگیزه مبارزه برای پاک سازی میهن را می دهد پس مرا از مرگ نترسانید که سالها پیش در پای این آرزو کشته شده ام . ارد بزرگ در سخنی بسیار زیبا می گوید : گل های زیبایی که در سرزمین ایران می بینید بوی خوش فرزندانی را می دهند که عاشقانه برای رهایی و سرفرازی نام ایران فدا شدند . بابک خرمدین اندکی بعد در حضور خلیفه تازی بغداد اینچنین به خاک و خون کشیده شد : خلیفه :عفوت میکنم ولی بشرطی که توبه کنی ! بابک :توبه را گنهگاران کنند٬توبه از گناه کنند. خلیفه :تو اکنو ن در چنگ ما هستی! بابک:اری ٬تنها جسم من در دست شما است نه روحم٬ دژ آرمان من تسخیر ناپذیر است. خلیفه :جلاد مثله اش کن! معلون اکنون چراغ زندگیت را خاموش میکنم. بابک روی به جلاد٬چشمانم را نبند بگذار باچشم باز بمیرم. خلیفه :یکباره سرش را ازتن جدا مکن٬ بگذار بیشتر زنده بماند! نخست دستانش را قطع کن!جلاد بایک ضربت دست راست بابک را به زمین انداخت.خون فواره زد.بابک حرکتی کرد شگفتی در شگفتی افزود٬زانو زده ٬خم شد وتمام صورتش را با خون گرمش گلگون گرد.شمشیر دژخیم بالا رفت وپایین آمد ودست چپ دلاور ساوالان را نیز از تن جدا کرد.فرزند آزاده مردم به پا بود٬ استواربود . خون از دو کتفش بیرون میجست . خلیفه :زهر خندی زد : کافر! این چه بازی بود که در آستانه مرگ در آوردی ؟ چرا صورت خود به خون آغشته کردی؟ چه بزرگ بود مرد٬چه حقیر بود مرگ٬ چه حقیر تر بود دشمن! پیش دشمن حقیر٬مردبزرگ٬بزرگتر باید. گفت : در مقابل دشمن نامرد ٬ مردانه بایدمرد ٬اندیشیدم که از بریده شدن دستانم ٬خون ازتنم خواهدرفت . خون که رفت٬ رنگ چهره زرد شود .مبادا دشمن چنان گمان کند از ترس مرگ است ٬خلق من نمیپسندندکه بابک در برابرگله ء روباه ان ترسی به دل راه دهد.... خلیفه از ته گلو نعره کشید: ببر صدایش را!!!! وشمشیر پایین آمد و سر. سری که هرگزپیش هیچ زورمند ستمگری فرود نیامده بود . هر بار که این داستان خوانده شود احساس می کنیم بابک هنوز هم زنده است و برای کشورش جان می دهد یادش گرامی باد . yasamin-atashi.blogspot.com
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نوشته شده در دوشنبه یازدهم مرداد ۱۳۸۹ساعت 1:50 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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نوشته شده در یکشنبه دهم مرداد ۱۳۸۹ساعت 15:15 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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پيامكهاي شب قدر
شب قدر، فصل نزول انوار رحماني بر بوستان جانهاي روحاني است. *** شب قدر، آبستن سپيده فلاح و رستگاري انسانهاي دل سپرده به مهر مهربانترين مهربانان است. *** شب قدر، شب حضور روح و ملايك در محضر امام زمان (عج) است. *** شب قدر، شبي است كه در عرصه آن انسان، ره صد ساله را يك شبه طي مي كند. *** شب قدر، حاوي نهر نوري است كه در زلال پر بركت آن جان مؤمنان از گناه تطهير مي شود. *** شب قدر، طلايه دار فلاح و رستگاري عارفان عاشق و عاشقان بيدل در بين شبهاي سال است. *** شب قدر، آواي ايمان را در گوش جان مؤمنان به غيب نجوا مي كند. *** شب قدر، شب شناخت قدر خويش است! *** شب قدر شبي است که بايد شکواييه هجران را درنورديد و به اميد وصل و ديدار، بيدار نشست و از جام طهور «سلام» تا مطلع «فجر» سرمست بود. *** شبي که بايد در عاشقي ثابتقدم بود. در طلب کوشيد و بيدار ماند و ديدار جست و احيا گرفت و به نيايش پرداخت و کار خير کرد و صالحات به جا آورد و به نيازمندان رسيد و دانايي طلبيد و به دانشآموزي پرداخت. *** شب قدر، شبي که بايد به ياد روي محبوب عزيز، آن يار پنهان رخسار، با دردمنديهاي عاشقانه ناليد و ديدار او را از خداي طلبيد. *** شب قدر، شبي که شياطين در بند اسارتند و آدميان ايمن از آنها. *** شبي که در آن خطاب ميآيد: کجايند جوانمردان شبخيز که در آرزوي ديدار، بيخواب و بيآرام بودهاند و در راه عشق شربت بلا نوشيدهاند، تا خستگي ايشان را مرهم گذاريم و اندر اين شب قدر ايشان را با قدر و منزلت گردانيم؛ که امشب، شب نوازش بندگان است و وقت توبه گنهکاران. *** شبي است که «ليلة البراتش» خوانند: دوش وقت سحر از غصه نجاتم دادند و اندر آن ظلمت شب آب حياتم دادند چه مبارک سحري بود و چه فرخنده شبي آن شب قدر که اين تازه براتم دادند *** شب قدر، فصل نزول آيات رحماني بر بوستان جانهاي روحاني است. *** شب قدر، گاه رويش جوانههاي الغوث الغوث بر عرصه لبهاي تائب است. *** شب قدر، بهترين منزلگاه نيايشگران سرسپرده به مهر حق است. *** شب قدر، وقت شناخت قدر خويش است. *** شب قدر، بهترين گاه آرايش صحيفه دل مؤمنان به زيور ذکر خداست. *** شب قدر، بزرگترين ميدانگاه سبقت گرفتن اولاد آدم در خيرات است. *** شب قدر، آواي ايمان را در گوش جان انسانها ترنم ميکند. *** شب قدر، فاصله مُلک و ملکوت را به حداقل ممکن ميرساند. *** شب قدر، گشاينده پنجره کشف و شهود بر منظر روح عارفان است. *** شب قدر، لالهاي شکفته در کوير شبهاي عادي سال است. *** آي فقيران غني، کجاييد که شبهاي قدر آمده است؟! *** تشنه ام اين رمضان تشنه تر از هر رمضاني شب قدر آمده تا قدر دل خويش بداني ليله القدر عزيزي است بيا دل بتکانيم سهم ما چيست از اين روز همين خانه تکاني *** تقديري سراسر خير، برکت، خرسندي، سلامت، خوشبختي، سعادت دنيا و آخرت، توشه شب قدرتان باد. *** خبر آوردند که امشب از هزار شب بهتر است و يک اتفاق ويژه مي افتد و آن اينکه امشب دست ملکوت به طرف زمين کشيده مي شود. *** کجاييد خاکيان سدره نشين و زمينيان آسماني که ملکوتيان امشب شيفته شمايند؟! *** شب قدر، سرنوشت يکسال ما تعيين مي شود. اين شبها را از دست ندهيم. براي تعجيل در فرج مولايمان دعا کنيم. *** فرشته ها براي آزادي انسان ها از دستان شيطان و بخشش معاصي و بردن آنها به ملکوت مسابقه داده و منتظر نداي بنده خدا هستند. (اللهم لبيک) مرا دعا کنيد. *** شب قدر است و من قدري ندارم چه سازم توشه قبري ندارم *** مبادا ليله القدرت سرآيد گنه بر ناله ام افزون تر آيد مبادا ماه تو پايان پذيرد ولي اين بنده ات سامان نگيرد *** خدايا قدر ما را به قدر مولاعلي(ع) نزديک فرما. *** الهي آن شب که همه قرآن به سر مي کنند ما را توفيق بده قرآن را به دل کنيم. *** امشب تمام آینه ها را صدا کنید گاه اجابت است رو به سوی خداکنید ای دوستان آبرودار در نزد حق درنیمه شب قدرمرا هم دعا کنید *** چون نامه جرم ما به هم پیچیدند بردند به دیوان عمل سنجیدند بیش ازهمگان گناه مابود ولی ما را به محبت علی(ع)بخشیدند. با عرض تسلیت در لیالی قدر این حقیر را ازدعای خیرخویش فراموش نکنید.التماس دعا *** مارا به دعا کاش فراموش نسازند رندان سحر خیز که صاحب نفسانند *** از عرش صدای ربنا می آید آوای خوش خدا خدا می آید فریاد که درهای بهشت باز کنید مهمان خدا سوی خدا می آید *** گویند کریم است و گنه می بخشد گیرم که ببخشد زخجالت چه کنم *** یا رب ز تو امروز عطا می طلبم هشیاری و بخشش خطا می طلبم مقبولی روزه و نماز و طاعات از درگه لطفت به دعا می طلبم *** ز مردم دل بکن یاد خدا کن خدا را وقت تنهایی صدا کن در آن حالت که اشکت می چکد گرم غنیمت دان و ما را هم دعا کن *** شب قدر است و من قدری ندارم چه سازم توشه ی قبری ندارم . . . *** خير، برکت، خرسندی، سلامت، خوشبختی و سعادت دنيا و آخرت، توشه شب قدرتان باد. *** امشب ... از آسمان باران انا انزلنا بر فرق زمين مي بارد ... امشب چشمانم را با آب توبه مي شويم و کلام قرآن در دهانم مي ريزم تا خواب چشمانم را نيازآرد ... *** مبادا ليلة القدرت سر آيد گنه بر ناله ام افزونتر آيد مبادا ماه تو پايان پذيرد ولي اين بنده ات سامان نگيرد منابع: www.parsclubs.com
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نوشته شده در جمعه هشتم مرداد ۱۳۸۹ساعت 2:23 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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نوشته شده در چهارشنبه ششم مرداد ۱۳۸۹ساعت 22:59 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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پیرمرد و الاغ
کشاورزی الاغ پیری داشت که یک روز اتفاقی به درون یک چاه بدون آب افتاد. کشاورز هر چه سعی کرد نتوانست الاغ را از درون چاه بیرون بیاورد.
مردم روستا تصمیم گرفتند چاه را با خاک پر کنند تا الاغ زودتر بمیرد و مرگ تدریجی او باعث عذابش نشود.
بار خاک های روی بدنش را می تکاند و زیر پایش می ریخت و وقتی خاک زیر پایش بالا می آمد، سعی می کرد روی خاک ها بایستد.
ادامه دادند و الاغ هم همینطور به بالا آمدن ادامه داد تا اینکه به لبه چاه رسید و در حیرت کشاورز و روستائیان از
چاه بیرون آمد … نتیجه اخلاقی : مشکلات، مانند تلی از خاک بر سر ما می ریزند و ما همواره دو انتخاب داریم: اول اینکه اجازه بدهیم مشکلات ما را زنده به گور کنند و دوم اینکه از مشکلات سکویی بسازیم برای صعود!
در برخورد با مشکلات می توانید یک جور دیگر فکر کنید.
هنگامی که ناسا برنامه ی فرستادن فضانوردان به فضا را آغاز کرد با مشکل کوچکی روبرو شد ، آنها دریافتند که خودکارهای موجود در فضای بدون جاذبه کار نمی کنند ، جوهر خودکار به سمت پایین جریان نمی یابد و روی سطح کاغذ نمی ریزد برای حل این مشکل ….آنها شرکت مشاورین اندرسون را انتخاب کردندتحقیقات بیش از یک دهه طول کشید ، دوازده میلیون دلار صرف شد و در نهایت آنها خودکاری طراحی کردند که در محیط بدون جاذبه می نوشت زیر آب کار می کرد ، روی هر سطحی حتی کریستال می نوشت و در دمای زیر صفر تا سیصد درجه ی سانتیگراد کار می کرد.
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نوشته شده در چهارشنبه ششم مرداد ۱۳۸۹ساعت 22:41 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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..:: تدبیر::..
داستان درباره کوهنوردی ست که می خواست بلندترین قله را فتح کند. بالاخره بعد از سالها آماده سازی خود، ماجراجو یی اش را آغاز کرد. اما از آنجایی که آوازه فتح قله را فقط برای خود می خواست تصمیم گرفت به تنهایی از قله بالا برود. او شروع به بالا رفتن از قله کرد، اما دیر وقت بود و به جای چادر زدن همچنان به بالا رفتن ادامه داد، تا اینکه هوا تاریک تاریک شد. سیاهی شب بر کوهها سایه افکنده بود و کوهنورد قادر به دیدن چیزی نبود. همه جا تاریک بود .ماه و ستاره ها پشت ابر گم شده بودند و او هیچ چیز نمی دید. در حال بالا رفتن بود، فقط چند قدمی با قله فاصله داشت که پایش لغزید و با شتاب تندی به پایین پرتاب شد. در حال سقوط فقط نقطه های سیاهی می دید و به طرز وحشتناکی حس می کرد جاذبه زمین او را در خود فرو می برد. همچنان در حال سقوط بود ... و در آن لحظات پر از وحشت تمامی وقایع خوب و بد زندگی به ذهن او هجوم می آورند. ناگهان درست در لحظه ای که مرگ خود را نزدیک می دید حس کرد طنابی که به دور کمرش بسته شده، او را به شدت می کشد. میان آسمان و زمین معلق بود ... فقط طناب بود که او را نگه داشته بود و در آن سکوت هیچ راه دیگری نداشت جز اینکه فریاد بزند : خدایا کمکم کن ... ناگهان صدایی از دل آسمان پاسخ داد از من چه می خواهی؟ ـ خدایا نجاتم بده. آیا یقین داری که می توانم تو را نجات دهم ؟ ـ بله باور دارم که می توانی. پس طنابی را به کمرت بسته شده قطع کن ... لحظه ای در سکوت سپری شد و کوهنورد تصمیم گرفت با تمام توان اش طناب را بچسبد. فردای آن روز گروه نجات گزارش دادند که جسد یخ زده کوهنوردی پیدا شده ... در حالی که از طنابی آویزان بوده و دستهایش طناب را محکم چسبیده بودند، فقط چند قدم بالاتر از سطح زمین ... و شما چطور ؟ چقدر طنابتان را محکم چسبیده اید ؟ آیا میتوانید رهایش کنید ؟
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نوشته شده در چهارشنبه ششم مرداد ۱۳۸۹ساعت 1:52 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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شربتها و عرقيات گیاهی
شربتها و عرقيات گیاهی
عرق اترج ـ ( طبيعت گرم) نوع كوچك آن ترنج و بزرگ آن بالنك است معالج اسهال ـ استفراغ ـ ضد نفخ و درد ـ تقويت قلب و كبد و معده و رودهها و پوست عرق بيد ـ ( طبيعت سرد و خنك) خواب آور ـ آرام بخش ـ تب بر ـ مدر ـ شوره سر ـ مفاصل عرق برگ گردو ـ پائين آوردنده قند خون ـ ضد عفوني قوي ـ بيماريهاي جلدي عرق بهار نارنج ـ ( طبيعت گرم و معتدل) آرام بخش ـ تقويت اعصاب و قلب ـ ضد تشنج ـ صد سكسكه ـ خواب آور عرق آويش ـ ( طبيعت گرم) اشتها آور ـ ضد نفخ و تشنج ـ ضد قارچ ـ تقويت بينائي ـ مجاري تنفسي خونريزي و ترشحات زنانه ـ بالا برنده فشار خون ـ رقيق كننده خون بعد از غذا ميل شود. عرق برگ چنارـ ( طبيعت سرد) بسيار سردـ تب بر ـ معالج تنگي نفس ـ مفيد براي رعشه و اعصاب چاق كننده عرق بومادران ـ ( طبيعت گرم) تقويت اعضاء قلب ـ درد ناحيه قلب ـ ورم معده ـ صرع تصفيه كننده خون ـ جلوگيري از خونريزي و اختلالات قاعدگي ـ تب كهنه ـ نفخ روده ـ سنگ كليه ـ قولنجهاي كبدي ـ رفع خستگي اعصاب ـ اختلالات بينائي عرق بولاغ اوتي ـ ( طبيعت گرم) مقوي معده و هضم كننده غذا ـ رفع سوء هاضمه رفع اسهال و استفراغ عرق خارخاسك ـ مدر قوي ـ شستشوي كليه و مثانه ـ سنگ شكن ـ مفيد براي سياه سرفه عرق خواجه باشي ـ مفيد براي بواسير ـ مدر ـ كليه و مثانه ـ درد مفاصل عرق رازيانه ـ (طبيعت گرم ) چون هورمون زنانه دارد مصرف زياد براي آقايان خوب نيست ـ ازديد شير مادران ـ اشتهار آور ـ مدر و قاعده آور ـ رفع سنگ كليه و مثانه عرق خار شتر ـ (طبيعت سرد) شستشوي كليه ـ مفيد براي سنگ كليه و مثانه ـ ثب و لرز ـ سياه سرفه ـ مدر قوي تصفيه خون و كبد عرق زنيان ـ (طبيعت گرم) ضد نفخ ـ بالابرنده فشار خون و نيروبخش ( يك فنجان در يك ليوان آب سرد بعد از غذا) ضد انگل ـ هضم كننده غذا ـ بادشكن ـ ضد سكسكه ـ رفع سموم بدن ـ رفع اعتياد ـ ضد پيسي ـ مقوي قواي جنسي ـ ضد عفوني قوي عرق زيره ( طبيعت گرم) نيرو دهنده ـ هضم كننده ـ ازدياد شير مادرـ رفع ناراحتيهاي روده ـ تصفيه خون بادشكن ـ ضد چاقي ـ ضد تنگي نفس ـ ( يك فنجان با يك ليوان آب بعداز غذا) عرق سيرـ زيبائي پوست ـ كم كننده رطوبتهاي معده و مفاصل ـ جلوگيري از نيكوتين سيكار و آلودگي هوا ضد باكتريها ـ ضد سرطان ـ پائين آورنده فشار خون ـ قند خون ـ چربي خون تقويت كلبولهاي قرمز خون ـ ورم روده ـ تنظيم كننده كلسترول ـ موهاي سفيد را سياه ميكند مفيد براي آب و هواي وبائي ـ عرق سير همان خواص سير را دارد بغير از بوي بد آن عرق شاه تره ـ ( طبيعت سرد) مدر ـ كم كننده غلظت و چسبندگي خون ـ صفرا بر ـ ضد يرقان مفيد براي خارش بدن ـ دفع صفرا و سوداي گرم ـ نارسائيهاي كبدي ـ مسهل خلطهاي سهگانه عرق شنبليله ـ مفيد براي اشخاص ضعيف ـ مسلولين ـ بيماري قند ـ استعمال خارجي براي قارچهاي پوستي ضد ورم گلوـ بواسير ـ كاهش تدهنده كلسترول ( يك فنجان دريك ليوان بعد از غذا) عرق كيالك ـ ( طبيعت خنك) ضد چاقي ـ تنظيم و تصفيه خون ـ بدخوابي ـ طپش و قلب و اضطراب جلوگيري از سخت شدن رگها ـ سركيجه عرق كاسني ـ ( طبيعت سرد) تسكين حرارت خون ـ ملين ـ يرقان ـ تقويت پوست ـ ورم مفاصل ـ ورم طحال ضد كلسترل ـ خون در ادرار ـ مقوي معده ـ تب بر عرق كرفس ـ رماتيسم ـ سنگ شكن ـ شستشوي كليه و مثانه ـ بواسيرـ درد مفاصل عرق گزنه ـ تنظيم كننده پرستات ـ عفونتهاي جلدي ـ استحكام لثه ـ زيادي شير مادران پائين آورنده قند خون ـ مدر عرق مرزه ـ ( طبيعت گرم ) درمان كننده قواي جنسي ـ نقرس ـ فلج ـ اسهال ـ صد انگل تقويت كودكان ضعيف ـ مفيد در نرمي استخوان ـ آسم ـ هضم كننده غذا ـ عرق بدن را كم ميكند ( يك فنجان در يك ليوان آب بعد از غذا) عرق گلاب ـ (طبيعت گرم و معتدل) مقوي اعصاب و قلب ـ درد چشم ـ رفع خلط خون ـ سخت كننده لثهها عرق نعناع – ( طبيعت گرم) ضد نفخ ـ باد شكن ـ ملين ـ اسهال ـ هضم كننده غذا ـ ضد انگل ـ بواسير ـ دل پيچه ـ اشتها آور اخلاط چهارگانه = يعني شبكه كلي خون و رگها و اعصاب لنفاوي يك مكان منظم شبكه خورشيدي چهار نوع خلط در سيستمهاي دروني بدن وجود دارد و زيادي هريك يا بيشتر آنها يا فقدان آنها ميتواند موجب بيماري گردد.
drfahmideh.blogfa.com/post-58.aspx
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نوشته شده در دوشنبه چهارم مرداد ۱۳۸۹ساعت 1:7 توسط مهدی خوش منظر قراملکی
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